Sunday, July 20, 2014

मुझे मेरी ही तलाश हैं

जाने कैसी यह ताडप हैं
जाने कैसी यह प्यास हैं
किस फ़िराक मे हैं दिल आज कल
जैसे मुझे मेरी ही तलाश हैं

लाखो चेहरे और अनगिनत आवाज़ें
झूठी मुस्काने और झूठे वादे
दुनिया के इस खोखलेपन मे
बस अब दर्द ही एक साचा एहसास हैं
मोहब्बत मे, रुसवाई मे और फिर बेवफ़ाई मे
जैसे मुझे मेरी ही तलाश है

टूटे दिल के टुकड़ो पे जिंदा हूँ मैं
साँसे तो बस बहाना भर ही हैं
बेआबरू होते शर्म और ख्वाहइसों मे
हर तरफ नफ़रत की ही साज़ हैं
खुद को खुद मे ही ढूंड रही हूँ मैं
जैसे मुझे मेरी ही तलाश है

2 comments:

  1. I loved it Smita...could connect to it :) keep writing!! I too need to start blogging again...

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  2. Thanks Pratishtha.... I am glad you liked it. Hope you too get back to writing soon.

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